Jul 15, 2012

विकल्प, बे-विकल्प

चला जा रहा हूँ मैं इन रास्तों पे, अपना भ्रम लिए की ये मेरे बनाए,
भूलता जा रहा हूँ ये राह ये मंज़िल, हैं मेरे नही पर परिस्थितियों के बाधित.

वो हौसला मैं जिसे अपना कह रहा हूँ, वो आँखों मे सपना भी मेरा नहीं है,
कुछ लोग मिले थे सफ़र बे-सफ़र, ये दिशा ये सोच उन्ही के दिए हैं.

अगर ना टकराते राहों में हम-तुम, तुम तुम ना होते, मैं मैं ना होता,
वो चाहत वो ख्वाब, बादल और ख़ुश्बू, वो दरिया का किनारा कुछ और ही होता.

नासमझ बन गया हूँ या सब समझ रहा हूँ, ये रस्में ये दुनिया भूलता जा रहा हूँ,
खुशी का हो प्याला या गम की लहर, ए ज़िंदगी तुझे मैं जिये जा रहा हूँ.


शुक्रिया,
विकास